कविता समय 2011: सत्रवार कार्यक्रम

February 23, 2011

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कविता समय 2011 पहला सत्रः कविता और यूटोपिया दोपहर 12 बजे से 2.30 बजे, 25 फरवरी नामवर सिंह, अशोक बाजपेयी, नरेश सक्सेना, वीरेन डंगवाल, कुमार अंबुज, आशुतोष कुमार संचालनः गिरिराज किराड़ू भोजनः 2.30 बजे से 3.30 बजे दूसरा सत्रः काव्य-पाठ एवं अलंकरण शाम 5 बजे से 8 बजे, 25 फरवरी चंद्रकांत देवताले एवं कुमार अनुपम […]

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होम फ्रॉम ए डिस्टेंसः हिन्दी कविता अंग्रेजी अनुवाद में

February 18, 2011

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  जनवरी 2011 में अपने पहले सेट में तीन हिन्दी पुस्तकें –  बोलेरो क्लास (प्रभात रंजन), टावर ऑफ़ सायलेंस (मनोज रूपड़ा) और मार्केस की कहानी (प्रभात रंजन) – तथा तीन स्वीडी उपन्यास –अ विंटर इन स्टोकहोम (आग्नेता प्लेयेल), द लेजेंड ऑफ़ द प्लेग किंग (लार्श एण्डर्सन) और  मनोलिस’ज मोपेड्स (यान हेनरिक स्वाह्न) – अंग्रेजी में प्रकाशित करने के […]

कविता समय सम्मानः चंद्रकांत देवताले और कुमार अनुपम को

February 16, 2011

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पहला कविता समय  सम्मान हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में एक चंद्रकांत देवताले को और पहला कविता समय युवा सम्मान युवा कवि कुमार अनुपम को दिया जायेगा. “दखल विचार मंच” और “प्रतिलिपि”  के सहयोग से हिंदी कविता के प्रसार, प्रकाशन और उस पर विचार विमर्श के लिए की गयी पहल  कविता समय के अंतर्गत दो वार्षिक कविता सम्मान […]

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Poetry as Site of Resistance (excerpts): Jeremy Schmall

February 14, 2011

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(कविता समय के उद्देश्यों से इत्तेफाक रखने वाला यह अंश असद ज़ैदी ने उपलब्ध कराया है, उनका शु्क्रिया; चित्र और  पाठ  यहाँ से साभार) If you’re willing to argue with me when I say that nearly every poetry book published in the last 30 years is an abject failure, it’s likely you’re among the small group […]

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कविता समय 2011: प्रतिभागी

February 13, 2011

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1   प्रो नामवर सिंह (दिल्ली)  2  अशोक बाजपेयी (दिल्ली) 3  ज्ञानेन्द्र पति (बनारस) 4  नरेश सक्सेना (लखनऊ) 5  वीरेन डंगवाल (बरेली) 6  असद जैदी (दिल्ली) 7  राजेश जोशी (भोपाल) 8  कुमार अंबुज (भोपाल) 9  नरेन्द्र जैन (विदिशा) 10  मदन कश्यप (दिल्ली) 11 लीलाधर मंडलोई (दिल्ली) 12  गोविंद माथुर (जयपुर) 13 हरिओम राजोरिया (अशोकनगर) 14 […]

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कविता समय 2011: ग्वालियरः 25-26 फरवरी

February 13, 2011

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पूरी दुनिया के साहित्य और समाज में कविता की जगह न सिर्फ कम हुई है उसके बारे में यह मिथ भी तेजी से फैला है कि वह इस बदली हुई दुनिया को व्यक्त करने, उसे बदलने के लिए अनुपयुक्त और भयावह रूप से अपर्याप्त है. खुद साहित्य और प्रकाशन की दुनिया के भीतर कथा साहित्य को अभूतपूर्व विश्वव्यापी केन्द्रीयता पिछले दो दशकों से मिली है. एक अरसे तक कविता-केन्द्रित  रहे हिंदी परिदृश्य में भी कविता के सामने प्रकाशन और पठन […]

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